।। श्रीसूर्यारुणसंवादे अपमृत्युहरं नृसिंहकवचम् ।।
अथापरं प्रवक्ष्यामि ह्यल्पमृत्यु हरंपरम्।
उपायं यत्कृतेनाङ्ग शीघ्रं मृत्युर्निवर्तते।।१।।
नृसिंहकवचं नाम स्तोत्रं परमदुर्लभम्।
यस्य धारणया क्षिप्रमल्पमृत्युर्विनश्यति।।२।।
अरुण उवाच-
भगवन्देवदेवेश कृपया परयाऽधुना।
नृसिंहकवचं दिव्यं गुह्यं भक्ताय मे वद।।३।।
सूर्य उवाच-
शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि नृसिंहकवचं शुभम्।
यस्य विज्ञानमात्रेण नश्यन्ति सकलापदः।।४।।
ग्रहबाधा प्रेतबाधा बाधा या कुलदोषजा।
कृत्यया जनिता बाधा शत्रुबाधा स्वकर्मजा।।५।।
शीघ्रं नश्यन्ति ताः सर्वाः कवचस्य प्रभावतः।
असाध्या ये च दुस्साध्या महारोगा भयङ्कराः।।६।।
सद्यो नश्यन्ति पठनात्कवचस्यास्य सारथे।
जलभीतिश्चाग्निभीतिर्भीतिः शत्रुगणादपि।।७।।
सिंहव्याघ्रादिजा भीतिः शीघ्रं सर्वा विनश्यति।
सङ्ग्रामे दुर्गमेऽरण्ये सङ्कटे प्राणसंशये।।८।।
पठतो विजयो रक्षा सुखं सौभाग्यसम्पदः।
पुत्रसौख्यं राजसौख्यं धनसौख्यमृणक्षयः।।९।।
कुटुम्बवृद्धिः कल्याणमारोग्यं विजयः सदा।
अल्पमृत्युभयं घोरं पाठादस्य विनश्यति।।१०।।
अल्पमृत्युहरश्चात उपायो न परः स्मृतः।
अल्पमृत्युहरं नाम कवचं चेदमुत्तमम्।।११।।
सिंहप्रणादान्मत्तोऽपि गजेन्द्रस्तु पलायते।
अल्पमृत्युस्तथा चास्य पाठात्सद्यो निरस्यते।।१२।।
सहस्रपञ्चकावृतिं पठेद्यः सुसमाहितः।
अल्पमृत्युभयं तस्य प्रभवेन्नैव कर्हिचित्।।१३।।
नृसिंहो मे शिरः पातु पातु भालं नृकेसरी।
भ्रुवौ नृसिंहो मे पातु नृसिंहो नयनद्वयम्।।१४।।
नृसिंहो नासिके पातु कर्णौ पातु नृकेसरी।
नृसिंहो मे मुखं पातु कपोलौ रक्षताद्धरिः।।१५।।
नृसिंहश्चिबुकं रक्षेत्कण्ठं पातु नृकेसरी।
स्कन्धौ पातु नृसिंहो मे भुजौ पातु नृकेसरी।।१६।।
करद्वयं नृसिंहोऽव्यान्नृसिंहो रक्षतादुरः।
नृसिंहो हृदयं पातु नृसिंहोऽव्यात्तथोदरम्।।१७।।
कुक्षिं नरहरिः पातु नाभिं पातु नृकेसरी।
बस्तिं च गुह्यदेशं च नृसिंहोऽव्यात्सदा मम।।१८।।
नृसिंहो जानुनी पातु जङ्घे पातु नृकेसरी।
पादौ गुल्फौ सदा पातु नृसिंहो मम रक्षकः।।१९।।
अग्रतः पृष्ठतो मेऽव्यात्तथा पार्श्वद्वयं सदा।
नृसिंहः सर्वगात्राणि मम रक्षतु सर्वदा।।२०।।
नृसिंहो रक्षतात्पूर्वे वह्निकोणे नृकेसरी।
नैरृत्यां नरसिंहोऽव्यानृसिंहः पातु पश्चिमे।।२१।।
नृसिंहो वायुकोणेऽव्यादुत्तरेऽव्यान्नृकेसरी।
नृसिंहोऽव्यात्तथेशाने ह्यध ऊर्ध्वं समन्ततः।।२२।।
जले सदा रक्षतु मां नृसिंहः स्थलेषु मां पातु सदा नृसिंहः।
नभस्तले भूमितले समन्तानृकेसरी रक्षतु सर्वदा माम्।।२३।।
दुर्गाध्वदुर्गभवनेषु च सङ्कटेषु
प्राणप्रयाणभयविघ्नसमुच्चयेषु।
शीतोष्णवातरिपुरोगभयेषु युद्धे
सङ्कष्टनाशनपरोऽवतु मां नृसिंहः।।२४।।
छिनत्तु चक्रेण सदाऽरिवर्गा-
न्सर्वान्नृसिंहो मम मृत्युरूपान्।
असाध्यदुस्साध्यसमस्तरोगा-
न्भिन्द्यान्नृसिंहः स्वगदाभिघातैः।।२५।।
प्रेतान्पिशाचान्सगणान्स्वनेन
शङ्खस्य विद्रावयतान्नृसिंहः।
कूष्माण्डबालग्रहयक्षरक्षः
स डाकिनीः शाकिनिकाः समस्ताः।।२६।।
खड्गेन मे मृत्युनिसर्गपाशं
सञ्छिद्य मां पातु सदा नृसिंहः।
सदाऽपमृत्योश्च तथाऽल्पमृत्यो-
र्विमोच्य मां रक्षतुनारसिंहः।।२७।।
भक्तसंरक्षणार्थाय विदार्यस्तम्भमुद्गतः।
नृसिंहो रक्षकः सोऽस्तु मृत्युः किं में करिष्यति।।२८।।
अट्टाट्टहासतो यस्य सर्वे देवाश्चकम्पिरे।
नृसिंहो रक्षकः सोऽस्तु मृत्युः किं मे करिष्यति।।२९।।
हिरण्यकशिपोर्वक्षो ददारनिशितैर्नखैः।
नृसिंहो रक्षकः सोऽस्तु मृत्युः किं मे करिष्यति।।३०।।
यस्य भ्रूभङ्गमात्रेण त्रस्तमासीज्जगत्त्रयम्।
नृसिंहो रक्षकः सोऽस्तु मृत्युः किं मे करिष्यति।।३१।।
उत्क्षिप्तसटया व्यग्रा देवा दैत्या विदुद्रुवुः।
नृसिंहो रक्षकः सोऽस्तु मृत्युः किं मे करिष्यति।।३२।।
यन्नामस्मरणादेव दह्यन्ते विघ्नराशयः।
नृसिंहो रक्षकः सोऽस्तु मृत्युः किं मे करिष्यति।।३३।।
यदङ्घ्रिघ्यानतःसद्यो विलीयन्तेऽघराशयः।
नृसिंहो रक्षकः सोऽस्तु मृत्युः किं मे करिष्यति।।३४।।
माता नृसिंहश्च पिता नृसिंहो भ्राता नृसिंहश्च सखा नृसिंहः।
बलं नृसिंहो द्रविणं नृसिंहः सर्वं नृसिंहो मम देवदेवः।।३५।।
इति ते कथितं पुत्र नृसिंहकवचं शुभम्।
अस्य धारणतः पाठादल्पमृत्युः प्रशाम्यति।।३६।।
शतं वाऽथ तदर्धं वा तदर्धं वा सदक्षिणम्।
विप्रेभ्यः पुस्तकं दद्यादल्पमृत्युप्रशान्तये।।३७।।
।। इति श्रीसूर्यारुणसंवादे अपमृत्युहरं नृसिंहकवचं सम्पूर्णम् ।।
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