हिन्दू धर्म और शास्त्रों के अनुसार, श्री कृष्ण सर्वोच्च शक्ति (परमात्मा) हैं, जो सभी देवताओं, दानवों और सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारक हैं । वे स्वयं शक्ति हैं, जिनसे सभी शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं । वे समय और देश से परे, हर जगह व्याप्त हैं, जो अपने भक्तों को ज्ञान और मुक्ति प्रदान करते हैं ।
🙏📿अक्रूर कृत श्रीकृष्ण स्तुति 📿🙏
(श्रीमद्भागवत पुराण, दशम स्कंध, अध्याय ४० से उद्धृत)
नतोऽस्म्यहं त्वाखिलहेतुहेतुं नारायणं पूरुषमाद्यमव्ययम्।
यन्नाभिजातादरविन्दकोशाद् ब्रह्माऽऽविरासीद्यत एष लोकः॥
मैं उन नारायण, आदिपुरुष, अव्यय, सभी कारणों के कारण, आपको नमस्कार करता हूँ, जिनकी नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए और जिनसे यह सारा जगत है।
भूस्तोयमग्निः पवनः खमादिर्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि।
सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूताः॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, महान्, अज (ब्रह्मा), मन, इन्द्रियाँ, सभी इंद्रियों के विषय, देवता – ये सभी जो जगत के कारण हैं, वे सब आपके अंगभूत हैं (आपके ही अंश हैं)।
नैते स्वरूपं विदुरात्मनस्ते ह्यजादयोऽनात्मतया गृहीताः।
अजोऽनुबद्धः स गुणैरजाया गुणात् परं वेद न ते स्वरूपम्॥
ब्रह्मा आदि (देवता) भी आपके स्वरूप को नहीं जानते, क्योंकि वे अनात्मा (शरीर) के रूप में माने जाते हैं; अज (ब्रह्मा) भी गुणों से बंधे होने के कारण आपके गुणों से परे स्वरूप को नहीं जान पाते।
वाणी सदा ते गुणवर्णने स्यात् कर्णौ कथायां ममदोश्च कर्मणि।
मनः सदा त्वच्चरणारविन्दयोर्दृशौ स्फुरद्धामविशेषदर्शने॥
मेरी वाणी सदा आपके गुणों का वर्णन करे, मेरे कान आपकी कथाएँ सुनें, मेरे हाथ आपके कर्म करें, मेरा मन सदा आपके चरणारविन्दों में रहे, और मेरी आँखें आपके दिव्य धाम के दर्शन करें।
नम: श्रीकृष्णचन्द्राय परिपूर्णतमाय च।
असंख्याण्डाधिपतये गोलोकपतये नम:॥
पूर्णतम श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार है। असंख्य ब्रह्मांडों के स्वामी, गोलोक के पति को नमस्कार है।
श्रीराधापतये तुभ्यं व्रजाधीशाय ते नम:।
नम: श्रीनन्दपुत्राय यशोदानन्दनाय च॥
श्री राधापति, व्रजाधीश (व्रज के स्वामी), नंद के पुत्र, यशोदा के नंदन आपको नमस्कार है।
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
यदूत्तम जगन्नाथ पाहि मां पुरुषोत्तम॥
हे देवकीसुत, गोविन्द, वासुदेव, जगत्पते, यदुवंशियों में श्रेष्ठ, जगन्नाथ, हे पुरुषोत्तम, मेरी रक्षा करें ।
महत्व:
यह स्तुति श्रीकृष्ण के विराट, सर्वव्यापी, और परम आराध्य स्वरूप का गान है, जिसमें भक्त अक्रूर अपनी इंद्रियों को भगवान की सेवा में समर्पित करने की प्रार्थना करते हैं, जो भागवत धर्म का सार है ।